समकालीन भारत में जाति आधारित राजनीति का बदलता स्वरूप: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

Authors

  • Kumari Shruti Patna University, Patna Author

DOI:

https://doi.org/10.64429/

Keywords:

जाति आधारित राजनीति, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, चुनावी व्यवहार, पहचान की राजनीति

Abstract

भारतीय समाज में जाति व्यवस्था एक प्राचीन एवं महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था रही है, जिसने सामाजिक संरचना, अवसरों के वितरण तथा राजनीतिक प्रक्रियाओं को गहराई से प्रभावित किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत ने लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को अपनाया, जिसके परिणामस्वरूप विभिन्न सामाजिक समूहों को राजनीतिक भागीदारी और प्रतिनिधित्व के अवसर प्राप्त हुए। इस प्रक्रिया में जाति भारतीय राजनीति का एक प्रमुख आधार बनकर उभरी। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य समकालीन भारत में जाति आधारित राजनीति के बदलते स्वरूप का अध्ययन करना तथा चुनावी राजनीति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के संदर्भ में उसकी भूमिका का विश्लेषण करना है। अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों, विद्वानों के विचारों, सरकारी रिपोर्टों, चुनाव आयोग के आँकड़ों, सीएसडीएस–लोकनीति सर्वेक्षणों तथा संसदीय प्रतिनिधित्व संबंधी आंकड़ों पर आधारित है। शोध के निष्कर्षों से स्पष्ट होता है कि भारतीय राजनीति में जाति का महत्व आज भी बना हुआ है, किंतु उसका स्वरूप समय के साथ परिवर्तित हुआ है। जहाँ पहले राजनीति मुख्यतः जातीय वोट बैंक और पहचान आधारित लामबंदी पर केंद्रित थी, वहीं वर्तमान दौर में विकास, कल्याणकारी योजनाएँ, सामाजिक न्याय, राष्ट्रवाद और क्षेत्रीय मुद्दे भी जातीय समीकरणों के साथ जुड़ गए हैं। राजनीतिक दल विभिन्न जातीय समूहों को आकर्षित करने के लिए नई रणनीतियाँ अपनाते हैं तथा उपजातियों को भी राजनीतिक रूप से संगठित करने का प्रयास करते हैं। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जाति समकालीन भारतीय राजनीति में अब भी एक प्रभावशाली कारक है, परंतु यह विकास और कल्याण की राजनीति के साथ मिलकर अधिक जटिल और बहुआयामी रूप धारण कर चुकी है।

Author Biography

  • Kumari Shruti, Patna University, Patna

    Research Scholar, Political Science Department

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Published

10.07.2026

How to Cite

Kumari Shruti. (2026). समकालीन भारत में जाति आधारित राजनीति का बदलता स्वरूप: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Wisdom Vortex: International Journal of Social Science and Humanities, 2(02), 77-85. https://doi.org/10.64429/