Bharatiya Naari ke Prati Swami Vivekanand ke Vichar
DOI:
https://doi.org/10.64429/Keywords:
स्त्री शिक्षा, स्त्री की स्थिति, महिलाओं की उपयोगिता, कल्याणकारीAbstract
19वीं सदी के उत्तरार्द में जिस समय स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था उस समय स्त्रियों की दशा अत्यंत दयनीय थी। इसका मुख्य कारण अशिक्षा, बालविवाह पर्दाप्रथा सत्ती प्रथा जैसे प्रचलित कुरीतियों समाज में व्यापक रूप से प्रचलित थे। स्वामी विवेकानंद स्त्री शिक्षा के प्रबल समर्थक थे। स्त्री शिक्षा के विषय में स्वामी विवेकानंद का विचार उदार था उनके लिए स्त्री तथा पुरूष दोनों को शिक्षा के पक्षधर थे। स्वामी विवेकानंद देश के कल्याण के लिए आधी आबादी के लिए शिक्षा को जरूरी मानते थे। वह समस्त भारतवासी में भगवान श्री रामचन्द्र तथा माता सीता के जीवन को आर्दश मानते थे। समस्त बालिका सीता के भव्य आदर्श की आराधना करती है। तथा भारतवर्ष के प्रत्येक स्त्री की यह आकांक्षा है कि वह अपने जीवन को भगवती सीता के समान पवित्र, भक्तिपूर्ण और सर्वसह बनाये। यहाँ तक भारत में कोई गुरू अथवा संत जब किसी स्त्री को आशीर्वाद देते है तो कहते है ‘‘तुम सीताजी के समान बनो’’ और किसी बलिका को आशीर्वाद देते है तब भी यह कहते है कि सीता का अनुकरण करो। भगवती सीता जी को पद-पद पर यातनाएँ तथा कष्ट मिलते रहे परन्तु उनके मुख से रामचन्द्र के प्रति एक भी कठोर शब्द नहीं निकाले। वह सभी विपतियों और कष्टो का वे कर्त्तव्य-बुद्धि से स्वागत करती रही तथा उसे भली भाँति निभाती रही है। यही सच्चा भारतीय आदर्श है। स्त्री हमेशा से ही पारिवारिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्थाओं समाज में महिलाओं की स्थिति जितनी सशक्त तथा प्रभावशाली होना चाहिए वह अभी भी पूर्ण रूप से नही हो पाया है। भारतीय संविधान में भी महिलाओं को पुरूष के समान अधिकार दिये गये है। फिर भी उनका शोषण किया जाता है। आज हम भले ही 21वीं सदी में पहुँच गए है लेकिन स्त्रियों के प्रति हमारी मानसिकता आज भी पुरानी ही रह गई है। इस शोध में स्वामी विवेकानंद भारतीय नारी के प्रति अपने विचार को प्रस्तुत किये है क्योंकि स्वामी विवेकानंद राष्ट्र के प्रगति में महिलाओं की उपयोगिता को महत्त्वपूर्ण मानते है उनका कहना है कि हमें महिलाओं की ऐसी अवस्था में ला देना है कि वह अपनी समस्याओं को अपने अनुसार स्वयं सुलझा सके। जो समाज के उत्थान तथा कल्याण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सके।
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