Chhayawad ki Virasat: Hindi Kavya me Bhawanatmak Gehrai ka Samikshatmak Vishleshan

Authors

  • P. Mishra Research Scholar Author

DOI:

https://doi.org/10.64429/

Keywords:

छायावाद, भावनात्मक गहराई, हिंदी काव्य, महादेवी वर्मा, प्रतीकवाद, आधुनिकता

Abstract

हिंदी साहित्य के इतिहास में छायावाद एक अत्यंत महत्वपूर्ण युग है, जिसने काव्य को बाह्य वास्तविकता से उठाकर आंतरिक भाव-भूमि की ओर मोड़ दिया। यह लेख छायावादी काव्य में निहित भावनात्मक गहराई का समीक्षात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह दर्शाता है कि कैसे जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा एवं निराला जैसे चार प्रमुख कवियों ने व्यक्तिगत दुख, प्रकृति-चेतना, आध्यात्मिक खोज और स्त्री-अस्तित्व जैसे विषयों को काव्य का केंद्र बनाकर हिंदी काव्य को एक नई दिशा दी। छायावाद ने न केवल भावनाओं को केंद्र में रखा, बल्कि उन्हें प्रतीकों, मुक्त छंद और नवीन भाषिक अभिव्यक्ति के माध्यम से अभिव्यक्त किया। यह आंदोलन पश्चिमी रोमांटिकता से प्रभावित अवश्य था, किंतु भारतीय अध्यात्म, अद्वैत दर्शन और भक्ति परंपरा के साथ उसका एक अद्वितीय सांस्कृतिक संवाद हुआ। लेख में छायावाद के मनोवैज्ञानिक आयामों—जैसे अवचेतन, आनिमा और अस्तित्वगत द्वंद्व—को भी उजागर किया गया है। साथ ही, महादेवी वर्मा के माध्यम से उभरती स्त्री-चेतना का लैंगिक विश्लेषण किया गया है, जो छायावाद को केवल भावुकता से ऊपर उठाकर एक सामाजिक-दार्शनिक आंदोलन के रूप में स्थापित करता है। यद्यपि प्रगतिवादियों ने छायावाद पर "अति-व्यक्तिवाद" और "सामाजिक विमुखता" का आरोप लगाया, तथापि यह लेख तर्क देता है कि आंतरिक वास्तविकता का चित्रण भी सामाजिक परिवर्तन का एक अभिन्न अंग है। आज के मानसिक स्वास्थ्य और अस्तित्वगत तनाव से ग्रस्त युग में छायावाद की भावनात्मक गहराई अत्यंत प्रासंगिक है। यह लेख निष्कर्ष निकालता है कि छायावाद केवल एक साहित्यिक धारा नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं की अमर विरासत है, जो आज भी हिंदी काव्य की धड़कन बनी हुई है।

Author Biography

  • P. Mishra, Research Scholar

    Research Scholar

    Hindi Department

    Sabarmati University, Ahmedabad, Gujrat

WVIJSH Vol. 01 Issue 04

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Published

17.01.2026

How to Cite

Mishra, P. (2026). Chhayawad ki Virasat: Hindi Kavya me Bhawanatmak Gehrai ka Samikshatmak Vishleshan. Wisdom Vortex: International Journal of Social Science and Humanities, 1(4), 27-31. https://doi.org/10.64429/